लोकसभा नहीं, विधानसभा नहीं — सबसे बड़ी ग्रामसभा!
📢 लोकसभा नहीं, विधानसभा नहीं — सबसे बड़ी ग्रामसभा!
सोचिये!
17वीं–18वीं शताब्दी में गांव और उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था के कारण भारत की GDP 23% थी।
आज शहर और विपणन आधारित अर्थव्यवस्था के कारण भारत की GDP सिर्फ 9% है।
शहर अंग्रेजों की डार है…
व्यवस्था है जिसे अंग्रेजों ने भारत को कमजोर करने के लिए बनाया।
उन्होंने रुपये का कूटकरण किया, गांवों को बर्बाद किया।
नयी वैश्विक व्यवस्था (NWO) के दबाव में आज भी सरकार गांवों को बर्बाद करने के लिए ग्रामसभा की जमीनें चौड़ी सड़कों, विकास, शहरीकरण के नाम पर उन कंपनियों को सीप रही है जिनमें यूरोपीय मूल के अमेरिकी लुटेरों का पैसा लगा है।
सरकार की नजर आपकी खेती पर भी है, क्योंकि सरकार जानती है—
जब तक गांव भोजन उगाते रहेंगे, जनता को गुलाम नहीं बनाया जा सकता।
विकास और शहरीकरण = ठेकेदार कल्याण योजना
यह जनता को टैक्स के जाल में फंसाने का तरीका है।
पंजाब के किसानों ने भूमि अधिग्रहण का विरोध किया तो पूरे पंजाब को डुबो दिया गया।
मध्य प्रदेश में बिना मुआवजा भूमि अधिग्रहण कानून लागू हो चुका है।
जहाँ मुआवजा मिल भी रहा है, वह कागज की अवैध मुद्रा कब तक चलेगी?
जमीन पीढ़ियों को पाल सकती है,
लेकिन यह कागज की अवैध मुद्रा एक पीढ़ी भी नहीं चला सकती।
कागज और डिजिटल मुद्रा सरकार जब चाहे बंद/अवमूल्यन कर सकती है।
📌 सिक्का अधिनियम के अनुसार वैध ₹1 = 777 mg सोना।
दिनांक: 24.07.2025
10 ग्राम सोना = ₹106,484
1 ग्राम सोना = ₹10,648
1 सोने की मोहर = 11.660 ग्राम
तो एक मोहर की कीमत = ₹1,24,155.68
चूंकि ₹15 = 1 मोहर
तो ₹1 के सिक्के की कीमत = ₹ 8,277
सभी राजनीतिक पार्टियां और पूंजीपति अमेरिका के पालतू हैं।
विश्वबैंक से कर्ज पर कर्ज लिया जा रहा है।
भारत की जमीनें अधिग्रहण कर पूंजीपतियों को सौंपी जा रही हैं।
उनके पास अरबों रुपये हैं, फिर भी उन्हें हमारी जमीनें चाहिए —
क्योंकि जमीन = असली स्वराज्य।
रुपये सरकार के नियंत्रण में हैं,
सरकार जब चाहे इसकी वैल्यू जीरो कर सकती है।
1947 में ₹1 = $1 था, आज रुपये का 80 गुना अवमूल्यन।
स्कूल बंद कर जमीनें बेचने की तैयारी है।
नशे को बढ़ावा: हर 1 किमी पर दारू के ठेके, ताकि सरकार कमाए।
फिर भी स्कूल चलाने में ‘खर्च’ लग रहा है!
सरकार ने 35 लाख करोड़ के नोट-सिक्के बनाए
और कर्ज बांट दिया 163 लाख करोड़ का!
जब मुद्रा कम है, जनता लौटा कैसे सकती है?
मतलब 128 लाख करोड़ की जनता की संपत्ति की कुर्की तय!
हर साल 10,000 मजदूर-किसान कर्ज से आत्महत्या।
सरकार खुद विश्वबैंक के कर्ज में डूबी है,
मूलधन तो दूर ब्याज भी नहीं चुका सकती,
फिर भी जनता को कर्ज बांट रही है।
जब भारत में 7 करोड़ डायबिटीज और 15 लाख कैंसर मरीज हैं,
तो सरकार कुछ सामान्य सर्दी-जुकाम के मामलों को "कोरोना" बनाकर
लॉकडाउन और जबरदस्ती वैक्सीन में अरबों क्यों खर्च करती है?
वैक्सीन से मौतों का जवाब देने की बजाय
प्रधानमंत्री ने वैक्सीन सर्टिफिकेट से अपनी फोटो हटवा ली।
यही है न्यू वर्ल्ड ऑर्डर (NWO)।
जनता की चुप्पी देखकर सरकार ने
भारत के संविधान को ताक पर रखकर
एक अमेरिकी संस्था WHO के साथ महामारी संधि (Pandemic Treaty) साइन की—
अब महामारी के समय भारत के कानून की बजाय
WHO का कानून चलेगा!
स्वास्थ्यकर्मी किसी भी नागरिक के घर में
बिना अनुमति घुस सकेंगे…
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